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Chhat puja कब,कैसे और क्यों मनाते हैं । जानें विस्तार से ।

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छट पर्व  वर्ष में दो बार मनाया जाता हैं। पहला  चैत शुल्क षष्टी  तथा दूसरा कार्तिक शुक्ल षष्ठी इन  दो  तिथियों में मनाया जाता हैं । छट पूजा या पर्व कार्तिक शुक्ल षष्ठी  को मुख्य रूप से माना जाता हैं चार दिन तक चलने वाले इस पर्व को डाला छट, छटी मईया, छट पूजा,बड़ा पर्व आदि के नाम से जाना जाता हैं इस पर्व को स्त्री और पुरूष  समान रूप से मनाते हैं।  छटी मईया की महिमा अपरम्पार है  छट पूजा हिन्दू धर्म  में मनाए जाने वाले पूजा में से एक हैं  वैसे तो कोई जाती धर्म या वर्ग अछूता नहीं है  इस लिए इस पर्व को  सभी धर्म के द्वारा  बहुत ही प्रेम तथा एकता से   मनाया जाता हैं इस पर्व को  यूपी,बिहार , और झारखंड   में बहुत धूम धाम से मनाया जाता हैं वैसे भारत के कई और जगह पर भी मनाते है।  यंहा तक की छटी मईया की चर्चा विदेशों में भी होने लगा  है। वे लोग जो इस पर्व को नहीं मानते वे भी अपना योगदान बड़ चड़ के देते दीपावली पर्व खत्म होते ही   छट पूजा जोर सोर से शुरू  हो जाता है वैसे त...

डायन की नज़र

प्यारा सा एक गांव था।  बदलते  मौसम में लोगों को कोई प्रकार की बीमारियां हो जाती और लोगों को लगता ये डायन- भूत की साया पड़ गई हैं। आइए जानते हैं उस  गांव के बारे में, उस गांव में अगर किसी बीमारी से जवान बेटे या पति का मौत हो जाता है तो लोग उस औरत को डायन समझने लगते थे। उसके साथ उठना बैठना  ठीक नहीं समझते  डरते थे उससे,  गांव के किसी भी  लोगों को अगर कोई छोटी बिमारी  जैसे  अच्छी नींद न होने के कारण  माथा ( सर) में दर्द सही भोजन या ठीक से भोजन न करने पर पेट में दर्द  आदि ऐसे छोटे- छोटे कोई प्रकार की बीमारियां हो जाती तो  लोग समझते ये सब डायन की काम हैं ।  घर से निकलने के बाद रास्ते में  कहीं उस तरह की औरत  मिल गई  जिसका पति या बेटा का किसी कारण से मौत हो गई हो  और  जिस काम के लिए निकला  और वो काम नहीं बना तो लोग उससे देख कर भड़क जाते और उससे क्रोध से बात करते तथा  मन ही मन   बहुत सारा गाली  दे जाते। क्या सच में डायन होती हैं ?.... यही जानने के लिए  मै उस ...

लटकती लाश

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बहुत दूर तक फैला हुआ एक जंगल था। पक्षियों की चहचाहट से तो सबको अच्छा लगता। लेकिन खूंखार जानवरों की आवाज़ से इंसान डर जाता था। उसी जंगल के उस पार  एक छोटा सा गांव बसा  हुआ था । गांव की जनसंख्या भी कुछ ख़ास नहीं थी। दुर्भाग्य की बात ये थी कि जंगल के बीचोबीच से होकर उन लोगों को गुजरना पड़ता था घर की रोजी रोटी के लिए  अपने परिवार के लिए क्यों कि बिना मेहनत का कुछ नहीं मिलता। इसलिए उन लोगों को जंगल के रास्ते से होकर गुजरना पड़ता था। रास्ता भी कुछ ख़ास नहीं कच्ची रास्ता बारिश के दिनों में तो ओर ज्यादा परेशानियां 10 km तक कीचड़ झेलनी पड़ती तब पक्की रोड का नसीब होता। ठंड का मौसम था दिन जल्दी- जल्दी ढल जाती इसलिए सब लोग अपना घर सूरज ढलने से पहले पहुंच जाते ।एक दिन किसी काम से एक आदमी को देर रात लगभग समय 12 बज़ चुके थे और उस जंगल के रास्ते से होकर वो अपने घर लौट रहे थे। पूर्णिमा की रात थी चांद- तारे टिमटिमा रहे थे। तभी रास्ते के किनारे एक पेड़ पर लटकते एक लाश को देख आदमी घबरा गया बहुत डर गया शरीर का रोम रोम खड़ा हो गया मुंह से कोई आवाज़ नहीं एकदम सन्नाटा डर के मारे उस लाश क...

स्वतंत्र भारत की दुःख भरी लम्हें।(15 अगस्त भासन)

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हैलो दोस्तो  आज मैं स्वतंत्रता दिवस पर बहुत ही अच्छा से   अपना भावना को प्रस्तान किया हैं,  जरूर पढ़िए उम्मीद हैं कि आपलोगो को  भी बहुत  अच्छा लगेगा। आदरणीय परम पूज्य प्राचार्य महोदय  शिक्षक  बृंद और  मेरे प्यारे - प्यारे भाईयो और बहनों ।  बड़े हर्ष  की बात है , कि आज ही के दिन यानी आजादी के( 70++year ke hisab se) वे बर्ष पूर्व के शुभ अवसर पर मुझ जैसे  अल्पज्ञ को  प्राचार्य द्वारा कुछ कहने  का अवसर मिला है। इस दौरान अगर मुझमे  कोई  त्रुटियां नजर आए तो  अबोध बालक समझकर  मुझे माफ़ करने की  कृपा करें। आज ही के  दिन हमारा देश लगभग  200 बर्षो तक की जकड़ी हुईं  गुलामी से मुक्त हुआ और हम आजाद हुए । आप लोग सभी भली भांति जानते है कि यह आजादी हमें  यूं ही नहीं मिल गया । इसके लिए  अनेक वीर सपूतों को फांसी के फंदे पर चढ़ना पड़ा सीने पर गोलियां  खाने पड़े ओर जेल के अंदर घिस पिटकर मरने पड़े । तब जाकर इस दिन का नया  सूर्योदय हुआ और यह खुशहाल दिन हमें देखने को मिल...

जीवनी एक गरीब परिवार की

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एक दिन की बात हैं। गांव में  एक  छोटा सा परिवार  रहता था । जो बहुत ही गरीब  परिवार  था। वो लोगों के घरों में  कुछ भी काम करता  और   उसके बदले जो मिलता पैसा या चावल   लेकर  शाम को घर लौट आता । इसी तरह अपना परिवार के साथ जिदंगी गुजारता था । उस गरीब आदमी का नाम  था रमन नाथ उसके  चार बच्चें थे।  दो बेटा और दो बेटी  दोनों बेटियों को शादी  हो चुकी थीं। और दोनों बेटे अपने पिता रमन नाथ के साथ सुबह को कम की तलाश में निकल जाते। अगर किसी के घर में काम मिलता तो कर लेते नहीं तो फिर अपना घर वापस लौट आते । एक दिन रमन नाथ अपने दोनो बच्चों लेकर जंगल की ओर लकड़ी लाने  चल दिए।  लकड़ी काट कर तीनों अपना अपना बोझा बांध कर एक पेड़ के नीचे बैठ कर  आराम कर रहे थे। तभी  जंगल के रास्ते से  होकर  गाॅव  के एक बच्चा  शहर से पढ़ाई कर के अपने चाचा के साथ मोटर साइकिल में बैठ कर घर लौट रहे थे, तो अचानक उनके छोटे बेटे श्याम नाथ का नजर उस बच्चे पर पड़ा। तो उसने अपने पिता से पूछा ? बापू...